आधा सच और आधी कल्पना से बनी हुई ‘अंतिमा’, जो मानव मन के कई झूठों को तोड़ने की कोशिश करती है

‘हर आदमी आधा हिस्सा अपनी कल्पना का इस्तेमाल करता है और आधा सच.....तब कहीं जाकर आप किसी से लगातार संवाद रख पाते हैं. तो अगर मैं उस अपनी आधी कल्पना वाले आदमी को लिखना चाहता हूं तो स्वार्थ कैसे हुआ? मैं अपना हिस्सा लिख रहा हूं. और मैं उसकी इजाजत भी लेना चाहता हूं, पर मैंने देखा है कि वह हमेशा घातक होता है. क्या हम अपने सपनों में आए लोगों से पूछते हैं कि आप मेरे सपने में हैं, आपको इससे कोई परेशानी तो नहीं है?’

ये बातें मानव कौल की नई किताब ‘अंतिमा’ के मुख्य पात्र रोहित के दिलो-दिमाग में चलती हैं. यह मानव कौल की पिछली पांच कहानी संग्रहों के बाद पहला उपन्यास है. और इसे कुछ अलग तरीके से लिखा भी गया है.

इस किताब में मानव कौल ने पेशे से लेखक रोहित के आस-पास कुछ पात्र गढ़ें हैं और उन्होंने कुछ छूट रोहित को भी दी कि वह भी अपने करीब कुछ पात्रों को रच सकें. इसमें रोहित के अलावा मुख्य पात्र अंतिमा हैं....अरू हैं....पवन हैं...दुष्यंत और वर्मा मैडम. बीच-बीच में रोहित के पापा और उनकी देखभाल करने की भूमिका में सलीम भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं.

जब हम ‘अंतिमा के पन्नों से गुजरते हैं, तो कुछ पात्र आपस में एकाकार होते हुए दिखते हैं और द्वंद के रूप में कुछ सवाल पैदा होते हैं.

रोहित इनसे लगातार जूझता है. और कल्पना और सच के बीच भ्रमित सा दिखता है. वह खुद से पूछता है कि क्या वह अपने आस-पास के लोगों को अपनी कहानी में शामिल करके कुछ गलत भी कर रहा है? इस बात पर उसकी अंतिमा के साथ बहस भी होती है.

‘तुम इस तरह अपने जीवन में आए लोगों को नहीं लिख सकते. मतलब किसने तुम्हें हक दिया है?’ अंतिमा कहती हैं.

‘मैं नाम बदल रहा हूं....और क्या करूं?’

‘गाने का एक शब्द बदलकर तुम खुद गा दो और कहो कि यह तुम्हारा ओरिजनल काम है?’

‘उसमें और इसमें अंतर है.’

‘मुझे तो यह ज्यादा खतरनाक लगता है.’

‘तो एक लेखक से तुम क्या अपेक्षा करती हो? वह कहां से लिखे?’

‘तुम तो काल्पनिक लिखते हो? तो इस्तेमाल करो अपनी कल्पना.’

‘कल्पना की बुनियाद तो रियल होनी चाहिए....वह कहां से लाऊं?’

‘मुझे नहीं पता, पर तुम ऐसे किसी के जीवन को उठाकर अपने लिखे में इस्तेमाल नहीं कर सकते. वह तुम्हारे लिखे में बस एक गूंगा-बहरा गुलाम बनकर रह जाएगा. तुम जो बोलोगे वो बोलेगा, तुम जहां कहोगे वह जाएगा. यह गुनाह है.’ 

मानव कौल ने इस उपन्यास को कोरोना महामारी के प्रकोप और लॉकडाउन के बैकग्राउंड में रचा है. इस किताब को पढ़ते हुए हमारी भीतर से एक-एक कर वे सारी स्मृतियां हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती हैं, जो हम सब के लिए एक नया अनुभव था.

लेखक ने रोहित के आत्म संवाद के जरिए उस वक्त की परिस्थितियों को रखा है,

‘हम सब अपने घरों में हैं और पूरी दुनिया अपनी खूबसूरती में बाहर फैली पड़ी है, पर हम उसे छू नहीं सकते, अपनी मर्जी से विचर नहीं सकते. हमने अपनी पूरी आजादी को समेटकर अपने घर के कपड़ों की तरह अपने शरीर से लपेट रखा है. तभी हमें पता चलता है कि हमारे पास घर के कपड़े बहुत कम हैं. हमने कभी सोचा नहीं था कि हमें घर के कपड़ों की इतनी जरूरत होगी. हम तो बाहर के कपड़े पहने हुए ही सोते थे. उन्हीं में अपने घरों में भटकते थे. हम अपने घरों में रहते हुए भी कभी घर में थे ही नहीं. हम हमेशा बाहर जाने या बाहर से आने के बीच की तैयारी में सुस्ताने के लिए यहां रूकते थे.’

लेखक ने सलीम के माध्यम से एक समुदाय विशेष के भीतर उठ रहे सवालों को जगह देने की कोशिश की है....और इन सवालों को संतुष्ठ करने की भी.

वहीं, रोहित और उसके पिता के बीच संवाद के दौरान हम कश्मीर के इतिहास से भी गुजरते हैं. और रिश्तों की उलझती-सुलझती धागों से भी. जब रोहित अपने पिता से संवाद करते हैं तो कई सवाल उनके भीतर भी पैदा होते हैं, जिसे न तो कोई पूछना चाहता है और न ही कोई इसका जवाब देना.

‘शायद बच्चों का बड़ा होना जितना मां-बाप को खलता होगा, उतना ही बच्चों का मां-बाप को लगातार बूढ़े होते देखना. पर ये बचकानी बातें हम एक-दूसरे से कहते नहीं हैं कि बड़ें मत हो या बूढ़े मत हो....हम बस एक-दूसरे से आंखे चुराने लगते हैं.’

मानव कौल रिश्तों की उन संकीर्ण गलियों में भी हमें ले जाते हैं, जिनका सामना करने से हम लगातार बचने की कोशिश करते हैं या फिर हम इसे किसी के साथ साझा भी नहीं कर पाते.

रोहित मां-पिता के साथ के अपने रिश्तों को लगातार मथते हुए दिखते हैं. वे कहते हैं,  

‘हम अपने मां-बाप के लिए कितना कम कर पाते हैं, यही एक बात है, जिसकी वजह से शरीर के केंद्र में कहीं खुजली उठती है, एक तेज टीस की तरह नाभि और पीठ के बीच में कहीं और हम पूरे शरीर में खुजाते फिरते हैं, पर वह खुजली शांत नहीं होती. एक अटकी हुई छींक की तरह हम पूरी तरह तृप्त नहीं हो पाते कि हमने उन्हें भरपूर प्रेम दिया है. हमेशा खलता है कि हम क्यों उतना साथ और स्पर्श सूंघ नहीं पाए जितना हमारे पास हमेशा से था.’

मानव कौल की ये खासियत रही है कि वे मानव मन के भीतर चल रहे द्वंदों को कागजों पर उकेर देते हैं....ये द्वंद तो हमेशा से इंसानों के भीतर चलते रहे हैं. इन द्वंदों को लेकर एक लेखक की बड़ी भूमिका होती है....लेखक भी इन द्वंदों को जीता है.....उससे जूझता है....लेकिन वह इसे कागजों पर शब्दों के जरिए उतार कर अपने भीतर के भार को हल्का कर लेता है. और पाठक इसे पढ़कर अपने भीतर चल रहे द्वंदों को समझने-देखने की समझ पाता है. यह एक लेखक की बड़ी कामयाबी होती है ....और यही ‘अंतिमा’ के बहाने मानव कौल भी यह करने में सफल दिखते हैं.

‘अंतिमा’ में रोहित, वर्मा मैडम और दुष्यंत के बीच जिस तरह से रिश्ते बनते और आगे बढ़ते हैं, उसे दर्ज करने में लेखक सफल हुए हैं. रिश्तों और हमारे खुद के अस्तित्व को लेकर लेखक अपने पात्र दुष्यंत के जरिए कहते हैं,

‘एक पैटर्न है, चारों तरफ और उस पैटर्न से हम सब जुड़े हुए हैं. एक बहुत बड़ी कलाकृति है, जिसमें हम महज एक ब्रश का स्ट्रोक हैं. और इस कलाकृति की सबसे खास बात है कि यह बदलती रहती है लगातार. आप अपना रंग और पैटर्न लिए सिर्फ कुछ ही समय तक इस कलाकृति का हिस्सा हैं. कुछ वक्त के बाद एक नया स्ट्रोक आपके ऊपर से गुजर जाएगा-एक नया रंग लिए और आप इस लगातार बदल रही कलाकृति के भीतर कहीं दफन हो चुके होंगे. हमारी बस इतनी ही शिरकत है.’

अगर इस किताब की कमियों की बात की जाए तो लेखक की कामयाबी ही पाठकों के लिए मुश्किलें पैदा करती हुई दिखती हैं. हम ‘अंतिमा’ के पन्नों से गुजरते हुए कब अपनी स्मृतियों में डूब जाते हैं, इसका ख्याल ही नहीं रखता है......फिर अचानक ही हम अपनी स्मृतियों को पीछे ढकेल कर इसके पन्नों को पलटते जाते हैं. लेकिन हम फिर कब स्मृतियों में गोते लगाते रहे हैं, हमारी चेतना को इसका ध्यान नहीं रहता. इस किताब को पढ़ते हुए ये क्रम लगातार चलता है....और ‘अंतिम’ के आखिर पन्ने तक पहुंचते-पहुंचते हमें एक बड़ा वक्त लग जाता है. लेकिन इस बहाने हम अपनी स्मृतियों को एक बार फिर जी लेते हैं.

 अंतिमा (उपन्यास)

लेखक- मानव कौल

प्रकाशक- हिन्द युग्म

कीमत – 200 रुपये   

Right now I am working as an Independent Journalist & Writer. Prior to this, I worked as a Reporter in Satyagrah.scroll.in and for CNBC. Along with politics, I have been writing on social and other issues including economy. I am interested in ground report.